॥ मुक्तकें ॥
कभी तो छटेगी यह घुप्प रजनी
नभ में प्रभात की अरुणीमा छाएगी।
पङ्ख फैलाए मोर से मोरनी रिजेगी
मन प्रफुल्लि हो प्रणय गीत गाएगी।
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वो नजरें चूराना वो वेरूखी से वतीयानाकितना कातिल लगता है तुम्हारा घबराना,
समझता हूँ हुआ क्या था? बेबस 'जीवन'
मुझे नहि भाता पता क्यूँ यूँ तेरा जी चूराना।
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पीटाया हूँ अपनों से औरों में तो खाक दम था,
चर्राया बुखार ईस्क ए इजहार क्यों यही कम था।
बोलना ही क्यों आल्फ़ज नही थे मेरे 'जीवन' वो,
सोचा मैने था, होंगे भी नहि, मुकरना ही वो गम था॥

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