Sunday, January 7, 2018

॥ मुक्तकें ॥

                      ॥ मुक्तकें ॥




कभी तो छटेगी यह घुप्प रजनी

नभ में प्रभात की अरुणीमा छाएगी।

पङ्ख फैलाए मोर से मोरनी रिजेगी

मन प्रफुल्लि हो प्रणय गीत गाएगी।

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वो नजरें चूराना वो वेरूखी से वतीयाना
कितना कातिल लगता है तुम्हारा घबराना,
समझता हूँ हुआ क्या था? बेबस 'जीवन'
मुझे नहि भाता पता क्यूँ यूँ तेरा जी चूराना।
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पीटाया हूँ अपनों से औरों में तो खाक दम था,
चर्राया बुखार ईस्क ए इजहार क्यों यही कम था।
बोलना ही क्यों आल्फ़ज नही थे मेरे 'जीवन' वो,
सोचा मैने था, होंगे भी नहि, मुकरना ही वो गम था॥


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