Friday, June 16, 2017

मुक्तकें

            ॥मुक्तकें॥

१.
वो पहाड  वो झरने में भी क्या
वो ऊदास  तो अपने में भी क्या
कहो ना जीवन प्यार ही नही
गुलसनें हों छठा ख्वाबें भी क्या?
.

बोरीयत कि  कई हद होती है
खासियतॊं की भी युँ कद होती है।
यारा तू तो फासानों की जीवन हो
कभी प्यारी  लब्ज भी ख़त होती है
.
३.
बसा हि लिया दील में तो,घर जाऊँ भी कैसे?
हों दिल में, सुन बात, रहूँ विन ठहरे ही कैसे?
होंगी बिती शामें, नजारें ठाहराया? भी 'जीवन'
अफ़सानों से हम गुजरें हैं और रुकें भी कैसे ?
.
४.
जाने दिल भी क्यों? फट गया
युं हि बातों मे दिल बट गया।
तुम्हे क्या कहूँ तन्हा हूँ 'जीवन'
कहो ना क्यों? मन यूँ ही हट गया।

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