घुलि मिली मुक्तकें।
१.
यह मरघट जैसे बडे नगर निरीह मै
स्याह सन्नाटा भरे बाजार अकेला है
खोता रहूँ अकेले यूँ ही क्या आ'जीवन'
चल अब कहीं एकान्त नितान्त है।
२.
क्या शबाओं का कोई अाखेटक नहि यहाँ
बता की कोई शर्वरी क्यूँ अप्रीया भारी जहाॅ।
प्रिय प्रेमोद्गारों में प्रस्फुटित नवाङ्कुर 'जीवन'
प्रेमी हृदयको विदिर्ण शब्दबाण भारी जहाँ॥
३.
बोलते भी तुम नहि चुप क्यों हो
फिजुल बातें बना युं गुम क्यों हो
कोई मर्म न छुपा मेरा 'जीवन'
बेबसी में तुम उचाटते क्यों हो।।
४.
समन्दर जो जड, छुए कैसे ममत्वका आँचल यूँ ही
मञ्जरी तुलसी का भँवर श्रीराम, अगम्य ना क्यूँ ही,
आकाश से ऊँचे उन कन्धों का माप कैसे हो 'जीवन'
यानों में हम उडे, ऊन कन्धों में स्वातान्त्र्य रहें ज्यूँ ही।
५.


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